अजब सुरूर मिला है मुझको दुआ करके
के मुस्कुराया है खुदा भी सितारा वा करके
गदागरी भी एक अस्लूबे फन है जब मैंने
उसी को माँग लिया उससे इल्तिजा करके
शब्बे फ़िराक़ के ज़ब्र को शिक़स्त हुई
के मैने सुबह तो कर ली खुदा खुदा करके
यह सोच कर कि कभी तो जवाब आएगा
मैं उसके दर पे खड़ा रह गया सदा कर के
यह चारागार हैं की इज़्तिमाये बदज़ौक़ा
वह मुझको देखें तेरी ज़ात से जुदा करके
खुदा भी उनको ना बख़्शे तो लुत्फ़ आ जाए
जो अपने आप से शर्मिन्दा हों खता करके
Showing posts with label नज़्म. Show all posts
Showing posts with label नज़्म. Show all posts
Saturday, July 21, 2007
Tuesday, July 10, 2007
ये छोटा बच्चा
कितना खु़श है
माँ की गोद में छोटा बच्चा
ये बहुत दूर है गुनाहों की लज़्ज़त से अभी
अभी इसने झूठ बोलना नहीं सीखा
न ये जानता है अपना मज़हब
न इसने लोगों को लड़ते देखा है
न इसने बेइमानी देखी
न इसने नफ़रत,न जुल्म,न ग़द्दारी देखी
अभी ये दुनियादारी नहीं समझता
अभी तो चाँद मांगता है ये
अपनी माँ तक ही दुनिया जानता है ये
कल ये बड़ा होगा
झूठ बोलना सीख जायेगा
गुनाह इसे आराम देंगे
नफ़रत,जुल्म,ग़द्दारी
मज़हब हो जायेंगे इसके
ये दुनियावालों की तरह खुदग़रज़ हो जायेगा
ऐ ख़ुदा काश
ये छोटा बच्चा
यूँ ही छोटा रहे
हमेशा
माँ की गोद में छोटा बच्चा
ये बहुत दूर है गुनाहों की लज़्ज़त से अभी
अभी इसने झूठ बोलना नहीं सीखा
न ये जानता है अपना मज़हब
न इसने लोगों को लड़ते देखा है
न इसने बेइमानी देखी
न इसने नफ़रत,न जुल्म,न ग़द्दारी देखी
अभी ये दुनियादारी नहीं समझता
अभी तो चाँद मांगता है ये
अपनी माँ तक ही दुनिया जानता है ये
कल ये बड़ा होगा
झूठ बोलना सीख जायेगा
गुनाह इसे आराम देंगे
नफ़रत,जुल्म,ग़द्दारी
मज़हब हो जायेंगे इसके
ये दुनियावालों की तरह खुदग़रज़ हो जायेगा
ऐ ख़ुदा काश
ये छोटा बच्चा
यूँ ही छोटा रहे
हमेशा
Monday, July 9, 2007
ज़रा सा मुस्कुराओ ना
गमों की जो फ़सील है
वह इस क़दर तवील है
ग़ज़ब तो ये है यह एक नहीं
फ़सील दर फ़सील है
तुम इसकी हर मुंडेर पर
आरजूओं के तेल से
चरागे दिल जलाओ ना
ज़रा सा मुस्कुराओ ना
वो फ़िर से याद आ गया
जो रूठ कर चला गया
उसे ख़याल भी नहीं
किसी का दिल दुखा गया
अब उसकी मीठी याद में
शबों को जाग जाग कर
ये रतजगे मनाओ ना
थोड़ा सा मुस्कुराओ ना
ये ग़म हमेशा आएँगे
ये दिल यूँ ही जलाएँगे
मगर ख़ुशी के आते ही
ये ग़म भी भूल जाएँगे
मलूल होगे ग़म से तुम
ज़रा फिर अपनी पलकों पे
सितारे झिलमिलाओ ना
ये आँसू मुझको सौंप के
ज़रा सा मुस्कुराओ ना
वह इस क़दर तवील है
ग़ज़ब तो ये है यह एक नहीं
फ़सील दर फ़सील है
तुम इसकी हर मुंडेर पर
आरजूओं के तेल से
चरागे दिल जलाओ ना
ज़रा सा मुस्कुराओ ना
वो फ़िर से याद आ गया
जो रूठ कर चला गया
उसे ख़याल भी नहीं
किसी का दिल दुखा गया
अब उसकी मीठी याद में
शबों को जाग जाग कर
ये रतजगे मनाओ ना
थोड़ा सा मुस्कुराओ ना
ये ग़म हमेशा आएँगे
ये दिल यूँ ही जलाएँगे
मगर ख़ुशी के आते ही
ये ग़म भी भूल जाएँगे
मलूल होगे ग़म से तुम
ज़रा फिर अपनी पलकों पे
सितारे झिलमिलाओ ना
ये आँसू मुझको सौंप के
ज़रा सा मुस्कुराओ ना
दिल की बातें
मिल गये थे एक बार जो लब से लब
उम्र भर होठों पे अपने मैं ज़बान फेरा
मैं तो फ़िर आप में रहता नहीं,दिल से
आगे फ़िर भींच के छाती से लगाने का मज़ा
दे के बोसा मुझे चितवन में जताता है वो शोख़
ऐसा पाया है तूने मज़ा कहीं और
क्या रुक के वो कहे है जो टक उससे लग चलूँ
बस बस परे हो, शौक़ ये अपने तईँ नहीं
उम्र भर होठों पे अपने मैं ज़बान फेरा
मैं तो फ़िर आप में रहता नहीं,दिल से
आगे फ़िर भींच के छाती से लगाने का मज़ा
दे के बोसा मुझे चितवन में जताता है वो शोख़
ऐसा पाया है तूने मज़ा कहीं और
क्या रुक के वो कहे है जो टक उससे लग चलूँ
बस बस परे हो, शौक़ ये अपने तईँ नहीं
ज़िन्दगी भी तो देता है मारने वाला
नज़र से दिल में मुहब्बत उतारने वाला
बहुत अजीज़ है मुश्किल में डालने वाला
नयी सहर के दिलासों के बीच
छोड़ गया हथेलियों से सूरज निकालने वाला
चहार सम्मत से अब धूप के अज़ाब में है
वो सायादार दरख्तों को काटने वाला
तेरा करम जो नवाज़े
तो मै भी बन जाऊँ
इबादतों मे तेरी दिन गुज़ारने वाला
तेरी अताएँ तो सभी को नवाज़ने वालीं
मैं साहिलों को भँवर से पुकारने वाला
दिया है ग़म
तो ज़िन्दगी भी तो देता है मारने वाला
बहुत अजीज़ है मुश्किल में डालने वाला
नयी सहर के दिलासों के बीच
छोड़ गया हथेलियों से सूरज निकालने वाला
चहार सम्मत से अब धूप के अज़ाब में है
वो सायादार दरख्तों को काटने वाला
तेरा करम जो नवाज़े
तो मै भी बन जाऊँ
इबादतों मे तेरी दिन गुज़ारने वाला
तेरी अताएँ तो सभी को नवाज़ने वालीं
मैं साहिलों को भँवर से पुकारने वाला
दिया है ग़म
तो ज़िन्दगी भी तो देता है मारने वाला
डरते हैं हर चराग़ की रौशनी से हम
रखते नहीं हैं बैर किसी आदमी से हम
फ़िर भी हैं अपने शहर में अजनबी से हम
देखा है जलते जबसे ग़रीबों का आशियाँ
डरते हैं हर चराग़ की रौशनी से हम
हम बोलते नहीं तो समझो न बेज़बान
हैं अपने घर की बात कहें क्यूँ किसी से हम
तेरी खुशी का आज भी इतना खयाल है
लेते नहीं हैं साँस भी अपनी ख़ुशी से हम
समझेगा तब कहीं वो समान दर हमारा दुख
अश्कों की दें मिसाल जो बहती नदी से हम
या तो हमारी नज़रों का सारा कुसूर है
या दूर हो गये हैं बहुत रौशनी से हम
फ़िर भी हैं अपने शहर में अजनबी से हम
देखा है जलते जबसे ग़रीबों का आशियाँ
डरते हैं हर चराग़ की रौशनी से हम
हम बोलते नहीं तो समझो न बेज़बान
हैं अपने घर की बात कहें क्यूँ किसी से हम
तेरी खुशी का आज भी इतना खयाल है
लेते नहीं हैं साँस भी अपनी ख़ुशी से हम
समझेगा तब कहीं वो समान दर हमारा दुख
अश्कों की दें मिसाल जो बहती नदी से हम
या तो हमारी नज़रों का सारा कुसूर है
या दूर हो गये हैं बहुत रौशनी से हम
Saturday, July 7, 2007
वो कौन था ?
पसपाई की खिफ़्फ़त का असर काट रहा है
मेरी तस्वीर का सर काट रहा है
ज़ालिम तुझे ये भी नही मालूम की अब तक
कोई तेरे हिस्से का सफ़र काट रहा है
ये बात अलग है कोई मक़सद ना हो हासिल
हर शख्स को हर शख्स मगर काट रहा है
वो अपनी निगाहों के इशारे से बराबर
हर देखने वाले की नज़र काट रहा है
वो कौन था ये है उसको गरज़ क्या
ज़ल्लाद तो बस हुक़म पे सर काट रहा है
मेरी तस्वीर का सर काट रहा है
ज़ालिम तुझे ये भी नही मालूम की अब तक
कोई तेरे हिस्से का सफ़र काट रहा है
ये बात अलग है कोई मक़सद ना हो हासिल
हर शख्स को हर शख्स मगर काट रहा है
वो अपनी निगाहों के इशारे से बराबर
हर देखने वाले की नज़र काट रहा है
वो कौन था ये है उसको गरज़ क्या
ज़ल्लाद तो बस हुक़म पे सर काट रहा है
मय
मेरा यही ख़याल है गो मैंने पी नहीं
कोई हसीं पिलाए तो यह शय बुरी नहीं
पैमान : वादा
वाइज़ : धर्मोपदेशक
शिकन : त्योरी
जबीं : माथा
कोई हसीं पिलाए तो यह शय बुरी नहीं
आते आते तेरे लब पर जो तबस्सुम बन जाये
उस अदा से कभी हमसे भी हो पैमान कोई
कमबख़्त ने शराब का ज़िक्र इस क़दर किया
वाइज़ के मुँह से आने लगी बू शराब की
आँचल ढला रहे मेरे मस्ते शबाब का
ओढ़ा गया कभी न दुपट्टा संभाल के
कोई मुँह चूम लेगा इस 'नहीं' पर
शिकन रह जायेगी यूँ ही जबीं पर
पैमान : वादा
वाइज़ : धर्मोपदेशक
शिकन : त्योरी
जबीं : माथा
Friday, July 6, 2007
ये रिश्ता
कोई सच्चे ख्वाब दिखा कर
आँखों में समा जाता है
ये रिश्ता...
ये रिश्ता क्या कहलाता है
जब सूरज थकने लगता है
और धूप सिमटने लगती है
कोई अनजानी सी चीज़ मेरी
साँसों से लिपटने लगती है
मैं दिल के क़रीब आ जाती हूँ
दिल मेरे क़रीब आ जाता है
ये रिश्ता क्या कहलाता है
इस गुमसुम झील के पानी में
कोई मोती आ कर गिरता है
इक दायरा बनने लगता है
और बढ़ के भँवर बन जाता है
ये रिश्ता क्या कहलाता है
तसवीर बना के रहती हूँ
मैं टूटी हुई आवाज़ों पर
इक चेहरा ढूँढती रहती हूँ
दीवारों कभी दरवाज़ों पर
मैं अपने पास नहीं रहती
और दूर से कोई बुलाता है
ये रिश्ता क्या कहलाता है
आँखों में समा जाता है
ये रिश्ता...
ये रिश्ता क्या कहलाता है
जब सूरज थकने लगता है
और धूप सिमटने लगती है
कोई अनजानी सी चीज़ मेरी
साँसों से लिपटने लगती है
मैं दिल के क़रीब आ जाती हूँ
दिल मेरे क़रीब आ जाता है
ये रिश्ता क्या कहलाता है
इस गुमसुम झील के पानी में
कोई मोती आ कर गिरता है
इक दायरा बनने लगता है
और बढ़ के भँवर बन जाता है
ये रिश्ता क्या कहलाता है
तसवीर बना के रहती हूँ
मैं टूटी हुई आवाज़ों पर
इक चेहरा ढूँढती रहती हूँ
दीवारों कभी दरवाज़ों पर
मैं अपने पास नहीं रहती
और दूर से कोई बुलाता है
ये रिश्ता क्या कहलाता है
तुम्हारा देखना
यूं बिछड़ना भी बहुत आसां ना था उस से मगर,
जाते जाते उस का वो मुड़ के दुबारा देखना
आईने की आंख ही कुछ कम ना थी मेरे लिए
जाने अब क्या क्या दिखायेगा तुम्हारा देखना
जाते जाते उस का वो मुड़ के दुबारा देखना
आईने की आंख ही कुछ कम ना थी मेरे लिए
जाने अब क्या क्या दिखायेगा तुम्हारा देखना
कोई घर ऐसा भी था
रुख बदलते हि्चकिचाते थे कि डर ऐसा भी था
हम हवा के साथ चलते थे मगर ऐसा भी था
लौट आतीं थीं पिछ्ले कई पतों की चिट्ठियां
घर बदल देते थे बाशिन्दे नगर ऐसा भी था
वो किसी का भी न था लेकिन सबका मोतबर
कोई क्या जाने कि उसमें हुनर ऐसा भी था
खुद से ग़ाफ़िल हो के पल भर न खुद को सोचता
इस भरी बस्ती में कोई बेखबर ऐसा भी था
हर नई रुत बदल जाती तख़्ती नाम की
जिसको हम अपना समझते कोई घर ऐसा भी था
हम हवा के साथ चलते थे मगर ऐसा भी था
लौट आतीं थीं पिछ्ले कई पतों की चिट्ठियां
घर बदल देते थे बाशिन्दे नगर ऐसा भी था
वो किसी का भी न था लेकिन सबका मोतबर
कोई क्या जाने कि उसमें हुनर ऐसा भी था
खुद से ग़ाफ़िल हो के पल भर न खुद को सोचता
इस भरी बस्ती में कोई बेखबर ऐसा भी था
हर नई रुत बदल जाती तख़्ती नाम की
जिसको हम अपना समझते कोई घर ऐसा भी था
एहसास
यादों का कोई मौसम हो
दोस्तों की जब महफ़िल हो
तन्हाई में भी एहसास नया हो
ख़्वाबों में भी उसका साथ हो
एक खूबसूरत झोंका ही सही
शायद मिलने की कोई बात हो
नये मौसमों का अब साथ हो
दिल को भी उसका इन्तिज़ार हो
चाहे जीत हो या अब हार हो
यादों और वादों का भी साथ हो
एक खूबसूरत झोंका ही सही
मुहब्बत को भी मुहब्बत की प्यास हो
ख़ता जो की है कोई सज़ा हो
इक़रार करने का भी अपना मज़ा हो
मिलेंगे हम जब उसकी भी दुआ हो
शरारत और शिक़ायत भी साथ हो
एक खूबसूरत झोंका ही सही
उसके दिल में मेरा ही एहसास हो
जब कभी मेरे होठों पे हंसी आई है
गोशा ए ज़हन में किसकी ये सदा आई है
अपने कमरे में तो मैं हूं मेरी तन्हाई है
वक्त बिगड़ा तो ये एहसास हुआ है मुझको
ठीक कहता था कोई दुनिया तमाशाई है
मैंने ख्वाबों को हक़ीक़त में बदलना चाहा
इसीलिए जागते रहने की सज़ा पाई है
हाल पूछो तो अभी रो पड़े जैसे दुनिया
चेहरे चेहरे पे यहां ग़म की घटा छाई है
यक ब यक चौंक उठे हादसे दुनिया भर के
जब कभी मेरे होठों पे हंसी आई है
अपने कमरे में तो मैं हूं मेरी तन्हाई है
वक्त बिगड़ा तो ये एहसास हुआ है मुझको
ठीक कहता था कोई दुनिया तमाशाई है
मैंने ख्वाबों को हक़ीक़त में बदलना चाहा
इसीलिए जागते रहने की सज़ा पाई है
हाल पूछो तो अभी रो पड़े जैसे दुनिया
चेहरे चेहरे पे यहां ग़म की घटा छाई है
यक ब यक चौंक उठे हादसे दुनिया भर के
जब कभी मेरे होठों पे हंसी आई है
एहसान मैं न लूंगा
दुनिया के हादसों से तुने मुझे बचा के
बेमौत मार डाला एहसान जता जता के.
तेरा चमकते सूरज एहसान मैं न लूंगा
कर लूंगा मैं उजाला खुद अपना घर जला के.
मैं टूट भी गया तो मुझमें चमक रहेगी
आईना पत्थरों से कहता है मुस्कुरा के.
तुझसे बिछड़ के आलम में हम जी नहीं सकेंगे
देखो दग़ा ना देना अपना मुझे बना के.
बेमौत मार डाला एहसान जता जता के.
तेरा चमकते सूरज एहसान मैं न लूंगा
कर लूंगा मैं उजाला खुद अपना घर जला के.
मैं टूट भी गया तो मुझमें चमक रहेगी
आईना पत्थरों से कहता है मुस्कुरा के.
तुझसे बिछड़ के आलम में हम जी नहीं सकेंगे
देखो दग़ा ना देना अपना मुझे बना के.
कभी क़ातिल कभी खु़दा
दिल के दीवारों दर पे क्या देखा
बस तेरा नाम ही लिखा देखा
तेरी आखों में हमने क्या देखा
कभी क़ातिल कभी ख़ुदा देखा
अपनी सूरत लगी पराई सी
जब कभी हमने आईना देखा
हाय अंदाज़ तेरे रुकने का
वक़्त को भी रुका रुका देखा
तेरे जाने में और आने में
हमने सदियों का फ़ासला देखा
फिर ना आया ख़याल जन्नत का
जब तेरे घर का रास्ता देखा
बस तेरा नाम ही लिखा देखा
तेरी आखों में हमने क्या देखा
कभी क़ातिल कभी ख़ुदा देखा
अपनी सूरत लगी पराई सी
जब कभी हमने आईना देखा
हाय अंदाज़ तेरे रुकने का
वक़्त को भी रुका रुका देखा
तेरे जाने में और आने में
हमने सदियों का फ़ासला देखा
फिर ना आया ख़याल जन्नत का
जब तेरे घर का रास्ता देखा
नशा है या आशनाई
मैं होश में था तो फिर उसपे मर गया कैसे
ये ज़हर मेरे लहू में उतर गया कैसे
कुछ उसके दिल में लगावट जरूर थी वरना
वो मेरा हाथ दबाकर गुज़र गया कैसे
जरूर उसके तसव्वुर की राहत होगी
नशे में था तो मैं अपने ही घर गया कैसे
जिसे भुलाये कई साल हो गये ऐ दोस्त
मैं आज उसकी गली से गुज़र गया कैसे
ये ज़हर मेरे लहू में उतर गया कैसे
कुछ उसके दिल में लगावट जरूर थी वरना
वो मेरा हाथ दबाकर गुज़र गया कैसे
जरूर उसके तसव्वुर की राहत होगी
नशे में था तो मैं अपने ही घर गया कैसे
जिसे भुलाये कई साल हो गये ऐ दोस्त
मैं आज उसकी गली से गुज़र गया कैसे
कोई तो राज़ है सताने में
लुत्फ़ आता है ग़म उठाने में
क्या रक्खा है शराबखाने में
वक़्त लगता है कुछ बनाने में
देर लगती नहीं मिटाने में
याद करने की फ़ुरसतें न मिलीं
उम्र गुज़री तुझे भुलाने में
चाहते हैं कि रूठ जाओ तुम
के फ़िर मज़ा आयेगा मनाने में
मुझको बताओ या ना बताओ
कोई तो राज़ है सताने में
क्या रक्खा है शराबखाने में
वक़्त लगता है कुछ बनाने में
देर लगती नहीं मिटाने में
याद करने की फ़ुरसतें न मिलीं
उम्र गुज़री तुझे भुलाने में
चाहते हैं कि रूठ जाओ तुम
के फ़िर मज़ा आयेगा मनाने में
मुझको बताओ या ना बताओ
कोई तो राज़ है सताने में
Subscribe to:
Posts (Atom)