एक कोशिश मिल बैठने की....
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Tuesday, February 26, 2008

मोती बरसा जाता ।

रिमझिम रिमझिम गगन मगन हो मोती बरसा जाता ।
शतदल के दल दल पर ढलकर
नयन नयन के तल में पलकर
बरस- बरस कर तरसे तन को हरित भरित कर जाता ।
हिलती डुलती लचक डालियाँ
बजा रही हैं मधुर तालियाँ
बून्दों की फुलझड़ियों में वह,गीत प्रीत का गाता ।
हृदय- हृदय में तरल प्यास है
प्रिय के आगम का हुलास है
नभ का नव अनुराग राग इस भूतल तल पर आता ।
शुभ्रवला का बादल दल में
ज्यों विद्युत्‍ नभ-नव-घन-तल में
चाव भरे चातक के चित में चोट जगाये जाता ।
चहल-पहल है महल-महल में
स्वर्ग आ मिला धरती-तल में
पल-पल में तरुतृण खग-मृग का रूप बदलता जाता ।
बुझी प्यास संचित धरती की
फली आस पल-पल मरती की
सुख दुःख में हंसते रहना यह इन्दु बताता ।
नभ हो उठा निहाल सजल हो
तुहिन बिन्दुमय ज्यों शतदल हो
शीतल सुरभि समीर चूमकर सिहर- सिहर तन जाता ।
झूमी अमराई मदमाती
केकी की कल- कल ध्वनि लाती
अन्तर-तर के तार- तार कीं बादल बरस भिंगोता ।
भींगी दुनिया भींगा वन- वन
भींग उठा भौंरों का गुँजन
कुंज- कुंज में कुसुम पुंज में मधुमय स्वर बन जाता ।

Monday, July 16, 2007

"सम्पादक की वाणी"

अंग्रेज़ी सभ्यता रीति को दूर भगाने वाली

जन-जन को झकझोर ज़ोर से रोज़ जगाने वाली

स्वयं बनी मार्जनी स्वरूपा "सम्पादक की वाणी"

भारत और भारती की जाग्रत वाणी कल्याणी

अपनी श्वेत प्रभा से भाषा से नवराष्ट्र विधात्री

सम्पादन की शुचि रुचि से जन जन की प्राण प्रदात्री

मनुज मनुज को यह प्रदीप्त देवत्व प्रदान करेगी

जीवन में यज्ञीय-प्रतिष्टा प्रद सम्मान वरेगी

सम्पादक की वाणि! देवि! यह अभिनन्दन है मेरा

शाक्त शक्ति जाग्रत कर दो तम हर दो हँसे सवेरा