हिंदी के रचनाकारों में दुष्यंत कुमार का नाम बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। कम ही रचनाओं के माघ्यम से उन्होंने जो बात कही वैसी बातें हजारों पन्नों काले करके भी नहीं कही जा सकती। तो पेश है उनकी कुछ चुनिंदा कविताएं ।
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा
ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था आप को धोखा हुआ
यहाँ तक आते आते सूख जाती हैं सभी नदियाँ
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा
ग़ज़ब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते
वो सब के सब परेशाँ हैं वहाँ पर क्या हुआ होगा
तुम्हारे शहर में ये शोर सुन-सुन कर तो लगता है कि
इंसानों के जंगल में कोई हाँका हुआ
कई फ़ाके बिताकर मर गया जो उस के बारे में
यहाँ पर सिर्फ़ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं
खुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा
चलो अब यादगारों की अंधेरी कोठरी खोलें
कम से कम एक वो चेहरा तो पहचाना हुआ होगा
मत कहो, आकाश में कुहरा घना
मत कहो आकाश में कुहरा घना है
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है
सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से
क्या करोगे सूर्य को क्या देखना है
इस सडक पर इस कदर कीचड बिछी है
हर किसी का पांव घुटने तक सना है
पक्ष और प्रतिपक्ष संसद में मुखर है
बात इतनी है कि कोई पुल बना है
रक्त वर्षों से खून में खौलता है
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है
हो गई है घाट पर पूरी व्यवस्था
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है
दोस्तों अब मंच पर सुविधा नहीं
आजकल नेपथ्य में संभावना है.

1 comments:
Post a Comment