खुल गये हैं बाँबियों के मुँह सुरंगों की तरह
आगये कुछ लोग सड़कों पर भुजंगों की तरह
सूर्य से लड़ने की जो करते हैं बातें रात भर
लुप्त हो जाते हैं वो दिन में पतंगों की तरह
वे अचानक ही कहानी के कथानक हो गये
और हम छपते रहे केवल प्रसंगों की तरह
वेदना की बाँसुरी को किस तरह सुन पाओगे
हर समय बजते रहोगे यदि मृदंगों की तरह
हम नहीं गन्तव्य तक पहुँचे तो कोई गम नहीं
पर न हम बैसाखियाँ लेगें अपंगों की तरह
Saturday, July 21, 2007
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1 comments:
very nice n inspirational....keep up the good work..
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